समाज के विभिन्न धर्मों के क्रम में आने वाले सबसे नीचे वर्ग के परिवार में जन्म हुआ था पालवंकर बल्लू  का एक अछूत कहे जाने वाले बल्लू शारदा एवं सीधा जीवन जीने में विचार रखते थे  | जब रणजी इंग्लैंड में प्रतिभा दिखा रहे थे | ठीक उसी समय पालवंकर बल्लू  पुणे क्लब में मेहनत मजदूरी कर रही थी वह पूना क्लब में मालिक का कार्य किया करते थे | वह अंग्रेज अफसरों एवं अधिकारियों के लिए क्रिकेट पिच को साफ करते नेट बिछाते थे | वह उन अंग्रेज अफसरों एवं अधिकारियों के लिए क्रिकेट पिच को साफ करते नेट भी चाहते थे | जो अधिकारियों की सेवा करते थे जो उनकी योग्यता से पूरी तरह अनभिज्ञ थे |
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यह ठीक वही समय था यह ठीक वही समय था जब भारत के सबसे बड़े अंग्रेज क्रिकेटर J जी ग्रे हुआ करते थे  | जब वह JG ग्र के संपर्क में आते हैं तो उन्हें बात ही बात में एक बोल डालने को कहते हैं | देखते ही देखते पालवंकर बल्लू  बल्लू जी ने उन्हें आउट कर दिया बल्लू की स्पीड देख कर वह पूरी तरह से स्तब्ध रह गई JGग्रे जी धीरे-धीरे अपनी बाकी की पूरी टीम से एक घंटा पहले आने लगते हैं और बल्लू की गेंद पर प्रैक्टिस करने लगते हैं  | इससे ना केवल ग्रेड की वेटिंग में दक्षता आई बल्कि पालवंकर बल्लू की गेंदबाजी और निखर कर सामने आने लगी  |  उस समय बल्लू को 8 आने मिलते थे जब भी वह ग्रह को आउट कर देते थे इस तरह दोनों की कलाएं और अधिक पेनी होने लगी |      

बल्लू की बॉलिंग   लेकिन यह तो होना ही था बल्लू की बॉलिंग टीम के बाकी सदस्यों से छुपी ना रह सकी टीम के बाकी सदस्यों में वह एक उभरते सितारे के रूप में उभर कर सामने आ ग  |पुणे के हिंदू जब यूरोपियन के साथ भिड़ना चाहते थे वे उनके साथ क्रिकेट में दो हाथ करना चाहते थे बल्लू उनके साथ खेले पर टीम के कुछ जाति विशेष के खिलाड़ियों को टीम में बल्लू के साथ खेलने पर ऐतराज था | समाज की बिगड़ी व्यवस्था होने के बावजूद उस समय एक मालिक के बेटे को टीम में शामिल कर दिया गया लेकिन हमारी बिगड़ी सामाजिक व्यवस्था की परछाई तो मैदान पर भी दिखी | पर बल्लू के अंदर कुछ कर दिखाने की चाहत थी इसलिए वे निर्भीक एवं निडर होकर बोलिंग करते एवं टीम में अपना पूरा योगदान देते बल्लू अब तो विकेट पर विकेट लेते गए वह अपनी प्रतिभा से सबको अचंभित करते चले गए |  मैदान के अंदर तो सब कुछ ठीक चलता रहा वह एक ही अगेन मिलकर खेल सकते थे |                                                                                                                               लेकिन मैदान से निकलते ही सब कुछ बदल जाता था टीम के बाकी खिलाड़ी एक साथ बैठकर चाय नाश्ता करते थे  | खाना खाते थे पर बल्लू उनके साथ बैठ नहीं सकता था यहां तक कि उनके खाने-पीने के बर्तन अलग थे और तो और मैदान में आने से पहले उन्हें खुद अपने बर्तन साफ करने होते थे |

बल्लू की विशेष प्रकार की उम्दा बॉलिंग  लेकिन बल्लू की विशेष प्रकार की उम्दा बॉलिंग के सामने किसी की एक न चली क्योंकि हुनर ही इतना आश्चर्यजनक था कि इस तरह का भेदभाव भी उनकी सफलता के आड़े ना आ सका |                                                                                                                                                                                                                    उस समय काल के राजा महाराजाओं ने उनकी प्रशंसा की एवं उन्हें अपनी टीम में शामिल किया उन्नीस सौ में महाराजा नटवर ने अपनी उम्दा टीम में उन्हें शामिल किया था सन उन्नीस सौ 61 में इस दलित खिलाड़ी ने महाराजा के साथ मिलकर मैच खेला था 1911 में महाराजा पटियाला ने देशभर के सभी अच्छे खिलाड़ियों को एकत्रित किया एवं उन्हें मैच खेलने के लिए इंग्लैंड ले गए इनमें से 14 खिलाड़ियों को सबसे अच्छी क्लास के खिलाड़ियों का दर्जा दिया गया पाल बनकर बल्लू इस टीम के मुख्य सदस्य थे एवं सबसे अच्छे गेंदबाज साबित हुए |

टीम में सबसे वरिष्ठ अनुभवी एवं योग्य खिलाड़ी  : टीम में सबसे वरिष्ठ अनुभवी एवं योग्य खिलाड़ी होने के बावजूद उन्हें बार-बार टीम की कप्तानी से नजरअंदाज किया गया | एक अछूत खिलाड़ी अपने साहस वह कौशल में टीमों में जगह तो बना सकता था लेकिन अपने से उच्च वर्ग के खिलाड़ियों का नेतृत्व करता नहीं बन सकता था | 

बदलाव आया                                                                                                                                                                        देर से ही सही पर कुछ सालों बाद इसमें परिवर्तन जरूर आया | कौशल से परिपूर्ण व्यक्ति को कोई कितना दबाने की कोशिश करें पर वह अपनी प्रतिभा के बल पर आगे जरूर आएगा |     उनके तीन और भाई हिंदू की टीम के लिए खेले और पालवंकर बल्लू , विट्ठल  बल्लू के छोटे भाई थे की टीम हिंदुओं का नेतृत्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ 1920 की महत्वपूर्ण घटना थी यह घटना गांधीजी के हरिजन आंदोलन से पहले की घटना थी |

 एक व्यक्ति की जाति से उसे पीछे धकेला जा सकता है पर योग्यता से कभी नहीं |